यह लेख मनरेगा (MGNREGA) के वास्तविक मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर देता है, इसकी उपलब्धियों, संरचनात्मक कमियों, वित्तीय बाधाओं और राज्यों के बीच असमानताओं को रेखांकित करता है। लेख यह भी विश्लेषण करता है कि प्रस्तावित VB-G RAM G योजना किस प्रकार सार्वभौमिक अधिकार से लक्षित लाभों की ओर झुकाव प्रदर्शित करती है और इससे गरीब राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता के बिना काम के अधिकार का विचार केवल नाममात्र का अधिकार बनकर रह जाने का जोखिम रखता है।
संवैधानिक पृष्ठभूमि और वैचारिक आधार
भारत में ग्रामीण रोजगार गारंटी की अवधारणा का विकास देश में सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और कल्याणकारी राज्य के दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38, 39, 41 और 46 राज्य को निर्देश देते हैं कि वह नागरिकों के लिए आजीविका के अवसर सुनिश्चित करे और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करे। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) वर्ष 2005 में पारित किया गया और 2 फरवरी 2006 से लागू हुआ। यह एक अधिकार-आधारित कानून है जो ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम 100 दिनों का गारंटीकृत अकुशल रोजगार प्रदान करने का वादा करता है।
यह अधिनियम केवल रोजगार योजना नहीं था, बल्कि यह लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, पंचायतों की भूमिका, सामाजिक लेखा-जोखा और पारदर्शिता जैसे सिद्धांतों को भी मजबूत करने का प्रयास था। मनरेगा का आधार यह था कि काम का अधिकार केवल वैचारिक नारा न रह जाए, बल्कि कानूनी रूप से लागू हो सकने वाला अधिकार बने। इस योजना ने पहली बार विकास के विमर्श को “कल्याण” से आगे बढ़ाकर “अधिकार” के प्रतिमान में परिवर्तित किया।
ऐतिहासिक भूमिका और प्रमुख उपलब्धियाँ
मनरेगा की सबसे बड़ी सफलता इसकी सार्वभौमिक पहुँच (Universal Access) और स्व-लक्षित प्रणाली (Self-targeting) रही। यह योजना आर्थिक स्थिति का औपचारिक परीक्षण किए बिना कार्य चाहने वाले को रोजगार उपलब्ध कराने के सिद्धांत पर आधारित है। इसने स्थानीय स्तर पर संसाधनों के द्वारपाल के रूप में कार्य करने वाले स्थानीय अभिजात वर्ग के नियंत्रण को कमजोर किया और ग्रामीण गरीबों को सीधे राज्य से जोड़ने वाला तंत्र विकसित किया।
योजना की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ इस प्रकार सामने आती हैं—
- ग्रामीण गरीबों के लिए सुरक्षा जाल (Safety Net) का निर्माण
- महिलाओं की श्रम-शक्ति भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि
- बुजुर्गों और कम रोजगार योग्य वर्गों के लिए अवसर
- विभिन्न अध्ययनों के अनुसार ग्रामीण मजदूरी दरों में वृद्धि
- पलायन में कमी के उदाहरण
- पंचायत-स्तरीय योजना निर्माण और सामाजिक लेखा-जोखा की परंपरा का विकास
विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में मनरेगा ने उन्हें स्वतंत्र आय का स्रोत और सार्वजनिक क्षेत्र में उपस्थिति प्रदान की। अनेक राज्यों में महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई। यह ग्रामीण स्तर पर लैंगिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
सांख्यिकीय साक्ष्यों के आधार पर मूल्यांकन
लेख में राज्यों के बीच असमानता के ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं। उदाहरण के लिए—
- केरल में 2011-12 में प्रति ग्रामीण निवासी कार्य-दिवस 3.6 दिन से बढ़कर 2023-24 में 11.3 दिन हो गया।
- उत्तर प्रदेश में यह आँकड़ा 2011-12 में 1.7 दिन से बढ़कर 2023-24 में मात्र 1.9 दिन ही रहा।
- उसी समयावधि में ग्रामीण मासिक प्रति व्यक्ति व्यय केरल में ₹6,611 और उत्तर प्रदेश में ₹3,481 दर्ज किया गया।
यह तथ्य बताता है कि मनरेगा जैसी सार्वभौमिक योजना भी व्यावहारिक स्तर पर कम विकसित राज्यों में कम समावेशी साबित हुई, जबकि सिद्धांततः ऐसे कार्यक्रमों का लाभ गरीब राज्यों और गरीब वर्गों को अधिक मिलना चाहिए था।
यहीं से लेख का केंद्रीय प्रश्न उभरता है— यदि मनरेगा सार्वभौमिक योजना थी तो गरीब राज्य पीछे क्यों रह गए?
वित्तीय आवंटन की संरचनात्मक समस्या
एक महत्वपूर्ण तर्क यह है कि योजना अपने प्रारंभ से ही अपर्याप्त वित्तपोषण का शिकार रही।
- यदि प्रति ग्रामीण परिवार के लिए केवल 50 दिन रोजगार की धारणा ली जाए,
- और न्यूनतम मजदूरी लगभग ₹234 प्रति दिन मान ली जाए,
- तो केवल मजदूरी भुगतान का व्यय ही ₹2,10,000 करोड़ से अधिक होता।
इसके विपरीत, महामारी के अतिरिक्त वर्षों को छोड़ दें तो केंद्र का वार्षिक आवंटन अक्सर ₹86,000 करोड़ से अधिक नहीं गया।
इस बड़े अंतर के कारण—
- वर्ष के दूसरे भाग में धनराशि की गंभीर कमी
- मजदूरी और सामग्री के भुगतान में लगातार विलंब
- राज्यों को अग्रिम राशि लगानी पड़ी
- अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों को अतिरिक्त लाभ मिला
वित्तपोषण की इस असमानता का सीधा परिणाम यह हुआ कि योजना की प्रभावशीलता राज्यों की राजकोषीय क्षमता और प्रशासनिक दक्षता पर निर्भर होती चली गई। इस प्रकार, एक अधिकार-आधारित कानून का संचालन क्षमता-आधारित लाभप्रदता पर टिक गया, जो मूल दर्शन के विपरीत था।
प्रशासनिक स्तर पर उत्पन्न चुनौतियाँ
यह इंगित करता है कि योजना के संचालन में केवल धनराशि की कमी ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं और क्रियान्वयन के ढांचे ने भी असमानताओं को जन्म दिया।
कई राज्यों में—
- मनरेगा को अन्य अवसंरचना योजनाओं के साथ जोड़ दिया गया
- सामग्री व्यय अन्य योजनाओं से और मजदूरी व्यय मनरेगा से दिया गया
- जिला प्रशासन पर अवसंरचना कार्य को प्राथमिकता देने का दबाव रहा
- इससे कई विकसित जिलों में, जहाँ स्थानीय मजदूरी मनरेगा दर से अधिक थी,
फिर भी कार्य दिखाने के लिए अनावश्यक MGNREGA कार्य कराए गए
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इससे कभी-कभी ठेकेदार-प्रशासन गठजोड़ जैसे विकृत रूप उभरे
परिणामस्वरूप योजना का वास्तविक लक्ष्य—
सबसे गरीब और वंचित परिवारों के लिए सुरक्षा जाल तैयार करना—
कई स्थानों पर खंडित हो गया।
अंतर-राज्यीय असमानता का गहराता संकट
लेख स्पष्ट रूप से बताता है कि समृद्ध राज्यों का प्रशासनिक तंत्र—
- समय पर प्रस्ताव भेजना
- डिजिटल प्रक्रियाएँ
- लेखा-जोखा
- सामाजिक ऑडिट
इन सभी मोर्चों पर अपेक्षाकृत अधिक सक्षम रहा।
इसके विपरीत, गरीब और पिछड़े राज्यों में—
- ग्राम पंचायतों की कमजोर संरचना
- कर्मचारियों की कमी
- तकनीकी संसाधनों का अभाव
- स्थानीय प्रशासनिक उदासीनता
के कारण कार्य-दिवस कम सृजित हो सके।
यही कारण है कि— “अधिकार सभी के लिए था, लेकिन पहुँच असमान बन गई।”
VB-G RAM G: प्रस्तावित विकल्प का विश्लेषण
प्रस्तावित VB-G RAM G योजना की ओर संकेत करते हुए यह कहा गया है कि यह मनरेगा के सार्वभौमिक अधिकार से हटकर लक्षित लाभ (Targeted Benefits) की ओर झुकाव प्रदर्शित करती है।
कुछ प्रमुख बिंदु—
- सार्वभौमिक अधिकार → मानकीकृत/लक्षित आवंटन
- धन को गरीब राज्यों और गरीब जिलों की ओर मोड़ने की संभावना
- लेकिन राज्यों के हिस्से में वित्तीय दायित्व की वृद्धि
सबसे बड़ा परिवर्तन केंद्र-राज्य अनुपात में है—
- मनरेगा में: 90 : 10
- VB-G RAM G में प्रस्तावित: 60 : 40
यह परिवर्तन विशेष रूप से गरीब राज्यों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि—
- उनके पास पहले से सीमित राजकोषीय स्थान
- अधिक ऋण भार
- सीमित राजस्व सृजन क्षमता
इस प्रकार, नई योजना में भले ही लक्षित आवंटन हो, परंतु यदि राज्य अपनी हिस्सेदारी नहीं दे पाए, तो सबसे अधिक हानि उन्हीं गरीब राज्यों को होगी, जिनके लिए यह योजना सबसे आवश्यक है।
नीति-स्तरीय निहितार्थ और आलोचनात्मक परीक्षण
इस बात पर बल देता है कि किसी भी नई योजना को सफल बनाने के लिए पहले पुरानी योजना का ईमानदार मूल्यांकन आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो—
- वही संरचनात्मक कमियाँ दोहराई जाएँगी
- नई योजनाएँ भी अपने लक्ष्यों से भटकेंगी
- सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और बढ़ सकती हैं
लेख इस बात को रेखांकित करता है कि “अधिकारों की घोषणा” और “संसाधनों की उपलब्धता” के बीच किसी भी प्रकार का असंतुलन अंततः नीति को केवल नाममात्र का घोषित अधिकार बनाकर छोड़ देता है।
सामाजिक प्रभाव एवं समावेशन का प्रश्न
मनरेगा ने ग्रामीण भारत में —
- सामाजिक सुरक्षा
- आय स्थिरीकरण
- महिला सशक्तिकरण
- ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण
जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रभाव डाला।
इसके बावजूद चुनौती यह है कि—
- प्रवासी श्रमिक
- अनुसूचित जाति/जनजाति समूह
- अत्यधिक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार
अभी भी कई राज्यों में पर्याप्त लाभ नहीं प्राप्त कर पाए हैं।
यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि यह संरचनात्मक सामाजिक बहिष्करण का संकेत भी है।
आगे का पथ: नीति सुधार के संभावित मार्ग
लेख के मुख्य निष्कर्षों और तर्कों के आधार पर कुछ जरूरी सुधार दिशा-निर्देश उभरते हैं—
- उचित और पर्याप्त वित्तपोषण – योजनाओं को राजकोषीय यथार्थ के अनुरूप संसाधन उपलब्ध कराना
- गरीब राज्यों के लिए विशेष प्रावधान – केंद्र-राज्य अनुपात में लचीलापन
- प्रशासनिक क्षमता-निर्माण – पंचायतों के लिए प्रशिक्षण और संसाधन
- समय पर भुगतान प्रणाली में सुधार
- डेटा-आधारित पारदर्शिता और सामाजिक ऑडिट
- लैंगिक और सामाजिक समावेशन की निगरानी
इन सुधारों के बिना कोई भी विकल्पीय योजना अपने उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकेगी।
निष्कर्ष और समाधान का मार्ग
निष्कर्ष के रूप में, मनरेगा का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसकी त्रुटियों को कितनी ईमानदारी से स्वीकार करते हैं। रोजगार के अधिकार को केवल कागजी अधिकार नहीं बल्कि एक वित्तीय प्रतिबद्धता वाला जनादेश होना चाहिए। संसाधनों की कमी और अनुचित बजटीय आवंटन इस योजना की मूल भावना को विकृत करते हैं। VB-G RAM G की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि आवंटन का आधार ‘मानक’ (Normative) हो जो गरीब राज्यों और जिलों को प्राथमिकता दे, न कि केवल प्रशासनिक दक्षता को।
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