यह लेख The Print में प्रकशित Artical “CEC Gyanesh Kumar is a constitutional failure. Damage is not procedural, it is existential” हैं, जिसमे मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल की आलोचनात्मक समीक्षा करता है, जिसमें पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक फेरबदल, मतदाता सूची संशोधन (SIR) में विसंगतियां और विपक्ष के प्रति कथित पूर्वाग्रह को रेखांकित किया गया है। यह निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता, संवैधानिक नैतिकता और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संकट: ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल और संवैधानिक विमर्श
संवैधानिक पृष्ठभूमि और अनुच्छेद 324
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के “अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण” की व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है। हालांकि, यह शक्ति निरंकुश नहीं है। लेख के अनुसार, यह शक्ति संवैधानिक नैतिकता, संघीय संतुलन और न्यायिक व्याख्याओं द्वारा मर्यादित है। उच्चतम न्यायालय ने PUCL बनाम भारत संघ (2003) मामले में स्पष्ट किया था कि मतदान का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। इसी प्रकार, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) बनाम भारत संघ (2002) में पारदर्शिता को चुनावी लोकतंत्र के केंद्र में रखा गया था। वर्तमान परिदृश्य में यह तर्क दिया गया है कि निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ अब निष्पक्षता के बजाय नियंत्रण के उपकरण के रूप में उपयोग की जा रही हैं, जो संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) के विरुद्ध है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप और बंगाल का मामला
लेख में 15 मार्च की सुबह पश्चिम बंगाल में किए गए व्यापक प्रशासनिक फेरबदल का उल्लेख है। चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP), कोलकाता पुलिस आयुक्त और ADG (कानून-व्यवस्था) जैसे पाँच महत्वपूर्ण स्तंभों को हटा दिया गया। अब तक बंगाल के 50 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों का स्थानांतरण किया जा चुका है। लेख इसे “प्रशासनिक शुद्धि” (Administrative Purge) की संज्ञा देता है और तर्क देता है कि यह सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। यह आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग एक तटस्थ अंपायर के बजाय एक “प्रवर्तक” (Enforcer) के रूप में कार्य कर रहा है, जिसका उद्देश्य राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को पंगु बनाना है।
नियुक्ति प्रक्रिया और न्यायिक चिंताएँ
मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया स्वयं विवादों के घेरे में रही है। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) के ऐतिहासिक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को कार्यकारी प्रभुत्व से बचाने के लिए एक स्वतंत्र चयन समिति का सुझाव दिया था। हालांकि, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम 2023 के माध्यम से सरकार ने चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया। लेख के अनुसार, ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति इसी नई प्रक्रिया के तहत हुई, जो पारदर्शिता के अभाव और विपक्ष की आपत्तियों की अनदेखी को दर्शाती है। ज्ञानेश कुमार का पूर्व में गृह मंत्री अमित शाह के अधीन सहकारिता सचिव के रूप में कार्य करना भी उनकी संस्थागत स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
विशेष गहन संशोधन (SIR) और ‘दस्तावेजी आतंक’
वर्ष 2025-2026 के दौरान किए गए विशेष गहन संशोधन (SIR) अभ्यास की तीखी आलोचना की गई है। जो प्रक्रिया 2002 में एक वर्ष तक चली थी, उसे कुछ ही महीनों में जल्दबाजी में पूरा किया गया। इसे “दस्तावेजी आतंक” का नाम दिया गया है, जहाँ लाखों नागरिकों के नाम हटा दिए गए या उन्हें “तार्किक विसंगति सूची” में डाल दिया गया। इसमें अमर्त्य सेन जैसी हस्तियों और वरिष्ठ अधिकारियों के नाम पर भी संदेह जताया गया। इस प्रक्रिया के दौरान अत्यधिक दबाव के कारण 100 से अधिक बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) और नागरिकों की मृत्यु या आत्महत्या की खबरें आईं। लेख का तर्क है कि निर्वाचन आयोग ने ‘प्रमाण का बोझ’ (Burden of Proof) मतदाता पर डाल दिया है, जो पीयूसीएल मामले के सिद्धांतों के विपरीत है।
विपक्ष के प्रति व्यवहार और संवाद शून्यता
एक संवैधानिक संस्था के रूप में निर्वाचन आयोग से सभी राजनीतिक दलों के साथ समान व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। लेख के अनुसार, ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में विपक्ष के साथ संवाद पूरी तरह टूट चुका है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा लिखे गए पत्रों का कोई उत्तर नहीं दिया गया। इसके विपरीत, विपक्ष के नेताओं द्वारा चुनावी विसंगतियों पर उठाए गए सवालों को “झूठ” करार देना और उन्हें शपथ पत्र पर शिकायत देने के लिए कहना संस्थागत गरिमा के प्रतिकूल माना गया है। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी.एन. शेषन का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वे सख्त थे लेकिन कभी पक्षपाती नहीं थे, जबकि वर्तमान नेतृत्व पर सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव का आरोप है।
चुनावी कार्यक्रम और निष्पक्षता पर प्रश्न
लेख में चुनाव तिथियों की घोषणा के समय पर भी सवाल उठाए गए हैं। प्रधानमंत्री द्वारा केरल, तमिलनाडु, असम और बंगाल में रैलियां समाप्त करने के ठीक 24 घंटे बाद चुनाव तिथियों की घोषणा की गई। साथ ही, असम, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहाँ कांग्रेस का कड़ा मुकाबला है, चुनाव एक ही चरण में कराए जा रहे हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में अलग दृष्टिकोण अपनाया गया है। 2024 के आम चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री के भाषणों में कथित ‘घृणास्पद भाषण’ (Hate Speech) पर आयोग की चुप्पी को भी अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन और वैधानिक मिलीभगत बताया गया है।
पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव
सीसीटीवी फुटेज के प्रतिधारण (Retention) को केवल 50 दिनों तक सीमित करने के निर्णय को भी संदेहास्पद माना गया है। ज्ञानेश कुमार द्वारा मतदान केंद्रों के सीसीटीवी फुटेज साझा न करने के पीछे “माताओं और बहनों” की सुरक्षा का तर्क देना, लेख के अनुसार, जवाबदेही से बचने का एक बहाना है। इसे मतदाताओं का “शिशुकरण” (Infantilization) कहा गया है। इसके अतिरिक्त, आधिकारिक दौरों के दौरान धार्मिक स्थलों पर जाना और जनता के बीच नाटकीय ढंग से व्यवहार करना एक संवैधानिक पद की गरिमा और आवश्यक ‘दूरी’ के सिद्धांतों के विरुद्ध माना गया है।
निष्कर्ष
ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल केवल प्रशासनिक ज्यादतियों का नहीं बल्कि एक संवैधानिक विफलता का उदाहरण है। अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 के सिद्धांतों का कथित उल्लंघन लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर रहा है। 193 सांसदों द्वारा उनके विरुद्ध महाभियोग (Impeachment) का नोटिस देना इस संस्थागत संकट की गंभीरता को दर्शाता है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए निर्वाचन आयोग जैसी संस्था का निष्पक्ष और पारदर्शी होना अनिवार्य है, अन्यथा ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ की अवधारणा केवल एक कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
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📌 UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न GS Paper I (Essay)
GS Paper II (Governance and Social Justice)
GS Paper IV (Ethics)
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