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उत्तराखंड का इतिहास – आद्यैतिहासिक काल (History of Uttarakhand – Prehistoric Period)

प्रागेतिहासिक काल व ऐतिहासिक काल के मध्य का समय आद्य ऐतिहासिक काल माना जाता है। यह मनुष्य के सांस्कृतिक विकास का दौर था इस काल के कुछ भाग में लिखित सामग्री प्राप्त नहीं हुई जबकि इसके अग्रिम चरण में लिखित प्रमाण मिले हैं इसलिए आद्य ऐतिहासिक काल का अध्ययन दो स्रोतों के माध्यम से किया जाता है।

  1. पुरातात्विक स्रोत
  2. लिखित स्रोत या साहित्यिक स्त्रोत

पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Sources)

पुरातात्विक साधन अत्यन्त प्रमाणिक होते हैं तथा इनके माध्यम से इतिहास के अन्ध-युगों की भी जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसके तहत मूलतः अभिलेख, स्मारक एवं मुद्रा सम्बन्धी अवशेष आते है। उत्तराखण्ड के इतिहास निर्माण में तो इनकी महत्ता और भी अधिक है।

पुरातात्विक स्रोतों को अध्ययन की दृष्टि से निम्न भागों में बांटा गया है –

ऊखल-सदृश गड्डे (Cup-Marks)

  • विशाल शिलाओं एवं चट्टान पर बने उखल के आकार के गोल गड्ढों को कप मार्क्स (Cup-marks) कहते हैं।
  • हेनवुड ने सर्वप्रथम चंपावत जिले के देवीधुरा नामक स्थान पर इस प्रकार के (ओखलियों) की खोज की।
  • सर्वप्रथम उत्तराखंड में पुरातात्विक स्रोतों की खोज का श्रेय हेनवुड (1856) को जाता है।
  • रिवेट-कारनक (1877 ई०) को अल्मोड़ा के द्वारहाट के कप मार्क्स चंद्रेश्वर मंदिर में लगभग 200 कप मार्क्स मिले जो कि 12 समांतर पंक्तियों में लगे हुए थे।
  • रिवेट-कारनक ने इन शैल चित्रों की तुलना यूरोप के शैलचित्रों से की।
  • डॉ० यशोधर मठपाल को द्वारहाट मंदिर से कुछ दूर पश्चिमी रामगंगा घाटी के नोला ग्राम में इन्हीं के समान 72 कप मार्क्स प्राप्त हुए।

ताम्र उपकरण

  • ये उपकरण तांबे के बने होते थे।
  • ताम्र निखात संस्कृति ऊपरी गंगा घाटी की प्राचीनतम संस्कृति है।
  • हरिद्वार के निकट बहादराबाद से ताम्र निर्मित भाला, रिंस, चूड़ियां आदि नहर की खुदाई के दौरान प्राप्त हुए। एच. डी. सांकलिया के अनुसार ये उपकरण गोदावरी घाटी से प्राप्त उपकरणों के समरूप थे।
  • वर्ष 1986 ई० में अल्मोड़ा जनपद से एक एवं वर्ष 1989ई० में बनकोट (पिथौरागढ़) से आठ ताम्र मानव आकृतियां प्राप्त हुए।
  • इन ताम्र उपकरणों से इस बात की पुष्टि होती है कि गढ़वाल – कुमाँऊ में ताम्र उत्पादन इस युग में होता था।

महापाषाणीय शवाधान

  • महापाषाणीय शवाधान का सबसे महत्वपूर्ण स्थल मलारी गांव (चमोली) है यहां 1956 ई० में महापाषाणीय शवाधान खोजे गये जिनकी खोज का श्रेय श्री शिव प्रसाद डबराल को जाता है। मलारी गांव मारछा जनजाति का गाँव है।
  • मलारी में मानव कंकाल के साथ-साथ भेड़, घोड़ो, आदि के कंकाल व मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए।
  • राहुल सांकर्त्यन ने हिमाचल प्रदेश के किन्नोर के लिपा गाँव में महापाषाणीय शवाधान की खोज की।

शवाधान – शवों को रखने की प्रथा शवाधान कहलाती है। हड़पा सभ्यता में तीन प्रकार की शवाधान विधियाँ थी।

  • पूर्ण समाधिकारण
  • आंशिक समाधिकारण
  • दाह संस्कार

लिखित स्रोत (Written Sources)

वेद

  • वेद चार है – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।
  • सबसे पुराना वेद ऋग्वेद नवीनतम वेद अथर्ववेद है।
  • उत्तराखंड का प्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद से प्राप्त होता है।
  • उत्तराखंड को ऋग्वेद में देवभूमि मनीषियों की पूर्ण भूमि कहा गया है।

ब्राह्मण ग्रन्थ

  • ब्राह्मण ग्रन्थ यज्ञों तथा कर्मकांडों के विधान और इनकी क्रियाओं को समझने के लिए आवश्यक होते हैं। इनकी भाषा वैदिक संस्कृति है।
  • ये पद्य में लिखे गये है।
  • प्रत्येक वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ होते हैं।
  • ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद का ब्राह्मण ग्रन्थ है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ – उत्तराखंड के लिए ‘कुरुओं की भूमि’ या ‘उत्तर कुरु’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
  • कौषीतकि ब्राह्मण ग्रन्थ वाक् देवी का निवास स्थान बद्री आश्रम में है।

पुराण

  • पुराण 18 हैं जिनमे सबसे बड़ा पुराण स्कंद पुराण है व सबसे पुराना पुराण मत्स्य पुराण है।
  • जातकों में भी हिमालय के गंगातट का वर्णन मिलता है।

स्कंद पुराण

  • स्कंद पुराण में 5 हिमालयी खंडो (नेपाल, मानसखंड, केदारखंड, जालंधर, कश्मीर) का उल्लेख है।
  • गढ़वाल क्षेत्र को स्कंद पुराण में केदारखंड कुमाँऊ क्षेत्र को मानसखंड कहा गया।
  • केदारखण्ड में गोपेश्वर ‘गोस्थल’ नाम से वर्णित है।
  • स्कंद पुराण में हरिद्वार को ‘मायापुरी’ कुमाँऊ के लिये कुर्मांचल शब्द का उल्लेख मिलता है।
  • कांतेश्वर पर्वत (कानदेव) पर भगवान विष्णु ने कुर्मा या कच्छपावतार लिया इसलिए कुमांऊ क्षेत्र को प्राचीन में कुर्मांचल के नाम से जाना जाता था। बाद में कुर्मांचल को ही कुमाँऊ कहा गया।
  • पुराणों में ‘मानसखंड’ ‘केदारखंड’ के संयुक्त क्षेत्र को – उत्तर खंड, ब्रह्मपुर एवं खसदेश नामों से संबोधित किया है।

ब्रह्मपुराण, वायुपुराण

  • ब्रह्मपुराण व वायुपुराण के अनुसार कुमाँऊ क्षेत्र में किरात, किन्नर, यक्ष, गंधर्व, नाग आदि जातियों का निवास था।

महाभारत

  • महाभारत के वनपर्व में हरिद्वार से केदारनाथ तक के क्षेत्रों का वर्णन मिलता है उस समय इस क्षेत्र में पुलिंद व किरात जातियों का अधिपत्य था।
  • पुलिंद राजा सुबाहु जिसने पांडवों की और से युद्ध में भाग लिया था कि राजधानी श्रीनगर थी।
  • महाभारत के वनपर्व में लोमश ऋषि के साथ पांडवों के इस क्षेत्र में आने का उल्लेख है।
  • आदि पर्व में उल्लेख – अर्जुन व उल्लुपी का विवाह गंगाद्वार में हुआ था।

रामायण

  • टिहरी गढ़वाल की हिमयाण पट्टी में विसोन नामक पर्वत पर वशिष्ठ गुफा, वशिष्ठ आश्रम, एवं वशिष्ठ कुंड स्थित है।
  • श्री राम के वनवास जाने पर वशिष्ठ मुनि ने अपनी पत्नी अरुंधति के साथ यहीं निवास किया था।
  • तपोवन टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित है जहां लक्ष्मण ने तपस्या की थी।
  • पौड़ी गढ़वाल के कोट विकासखंड में सितोन्सयूं नामक स्थान है इस स्थान पर माता सीता पृथ्वी में समायी थी। इसी कारण कोट ब्लॉक में प्रत्येक वर्ष मनसार मेला लगता है।
  • रामायणकालीन बाणासुर का भी राज्य गढ़वाल क्षेत्र में था और इसकी राजधानी ज्योतिषपुर (जोशीमठ) थी।

अभिज्ञान शंकुतलम

  • अभिज्ञान शंकुतलम की रचना कालिदास ने की।
  • प्राचीन काल में उत्तराखंड में दो विद्यापीठ थे बद्रिकाश्रम एवं कण्वाश्रम
  • कण्वाश्रम उत्तराखंड के कोटद्वार से 14 km दूर हेमकूट व मणिकूट पर्वतों की गोद मे स्थित है।
  • कण्वाश्रम में दुष्यंत व शकुंतला का प्रेम प्रसंग जुड़ा है शकुंतला ऋषि विश्वामित्र तथा स्वर्ग की अप्सरा, मेनका की पुत्री थी।
  • शकुंतला व दुष्यंत का एक पुत्र हुआ भरत जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।
  • इसी कण्वाश्रम में कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम की रचना की।
  • कण्वाश्रम मालिनी नदी के तट पर स्थित है।
  • वर्तमान में यह स्थान चौकाघाट के नाम से जाना जाता है।

मेघदूत

  • कालिदास द्वारा रचित मेघदूत के अनुसार अल्कापुरी (चमोली) कुबेर की राजधानी थी।

बौद्ध ग्रंथ

  • पाली भाषा के बौद्ध ग्रंथों में उत्तराखंड को हिमवंत कहा गया है।

अन्य

  • इतिहासकार हरीराम धस्माना, भजन सिंह, शिवांगी नौटियाल के अनुसार ऋग्वेद में सप्तसैंधव प्रदेश वर्तमान गढ़वाल ही था।
  • चमोली के निकट स्थित नारायण गुफा, व्यास गुफा, मुचकुंद गुफाओं में वेदों की रचना वादरायण या वेदव्यास ने की थी।
  • पुराणों के अनुसार मनु का निवास स्थान तथा कुबेर की राजधानी अलकापुरी (फूलों की घाटी) को माना जाता है।
  • ब्रह्मा के मानस पुत्रों दक्ष, मरीचि, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु और अत्रि का निवास स्थान गढ़वाल ही था।
  • बाणभट्ट की पुस्तक हर्षचरित में भी इस क्षेत्र की यात्रा पर आने-जाने वाले लोगों का उल्लेख मिलता है।
  • कल्हण की पुस्तक राजतरंगिणी में कश्मीर के शासक ललितादित्तय मुक्तापीड़ द्वारा गढ़वाल विजय का उल्लेख मिलता है।
  • जोशीमठ से प्राप्त हस्तलिखित ग्रन्थ ‘गुरूपादुक’ में अनेक शासक और वंशो का उल्लेख प्राप्त होता है।

विदेशी साहित्य

  • हर्षवर्धन के शासनकाल में ही चीनी यात्री ह्वेनसांग उत्तराखण्ड राज्य की यात्रा पर आया था, उसने अपने यात्रा वृतांत में हरिद्वार का उल्लेख ‘मो-यू-लो’ नाम से एवं हिमालय का ‘पो-लि-हि-मो-यू-ला’ अथवा ब्रह्मपुर राज्य के नाम से किया है।
  • चीनी यात्री युवान-च्वांड (ह्वेनसांग) ने सातवीं सदी में अपने यात्रा वृतांत में उत्तराखंड के विभिन्न शहरों का वर्णन किया है –
    • ब्रह्मपुर – उत्तराखंड
    • शत्रुघ्न नगर – उत्तरकाशी
    • गोविपाषाण – काशीपुर
    • सुधनगर – कालसी
    • तिकसेन – मुनस्यारी
    • बख्शी – नानकमत्ता
    • ग्रास्टीनगंज – टनकपुर
    • मो-यू-लो – हरिद्वार
  • मुगल काल में आए पुर्तगाली यात्री जेसुएट पादरी अन्तोनियो दे अन्द्रोदे 1624 में श्री नगर पंहुचा उस समय यहां का शासक श्यामशाह था।
  • तेमुर की आत्मकथा मुलुफात-इ-तिमुरी के अनुसार गंगाद्वार के निकट युद्ध करने वाले शासक –
    • बहरुज (कुटिला/कपिला राजा)
    • रतन सेन (सिरमौर का राजा)
  • फ्रांसिस बर्नियर ने हरिद्वार को शिव की राजधानी के रूप में उल्लेख किया है।

 

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उत्तराखंड का इतिहास – प्रागैतिहासिक काल (History of Uttarakhand – Prehistoric times)

उत्तराखंड की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं पौराणिक महत्ता की भांति यहां का इतिहास भी मानव सभ्यताओं के विकास का साक्षी है। प्रागैतिहासिक काल से ही इस भू-भाग में मानवीय क्रियाकलापों के प्रमाण मिलते हैं। विभिन्न कालों के अनुक्रम में उत्तराखंड के इतिहास का अध्ययन तीन भागों में किया जाता है –

1. प्रागैतिहासिक काल स्रोत :- पाषाणयुगीन उपकरण व गुहालेख चित्र
2. आद्यएतिहासिक काल स्रोत :- पुरातात्विक प्रमाण व साहित्यिक प्रमाण
3. ऐतिहासिक स्रोत :-  मुद्राए, ताम्रपत्र, अभिलेख, शिलालेख 

प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Times)

प्रागैतिहासिक काल वह काल है जिसकी जानकारी पुरातात्विक स्त्रोतों, पुरातात्विक स्थलों जैसे पाषाण युगीन उपकरण गुफा शैल चित्र आदि से प्राप्त होती है। इस समय के इतिहास की जानकारी लिखित रूप में प्राप्त नहीं हुई है। प्रागैतिहासिक काल को ‘प्रस्तर युग’ भी कहते हैं।

उत्तराखंड में प्रागेतिहासिक काल के साक्ष्य

पाषाणयुगीन उपकरण 

पाषाणयुगीन उपकरण वे उपकरण थे जिनका उपयोग मानव ने अपने विकास के विभिन्न चरणों में किया जैसे हस्त कुठार (Hand Axe), क्षुर (Choppers), खुरचनी (Scrapers), छेनी, आदि।
Stone Age Tools
उत्तराखंड में पाषाणयुगीन उपकरण अलकनन्दा नदी घाटी (डांग, स्वीत), कालसी नदी घाटी, रामगंगा घाटी आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए जिनसे इस बात की पुष्टि होती है कि पाषाणयुगीन मानव उत्तराखंड में भी निवास करते थे।

लेख व गुहा चित्र

उत्तराखंड के प्रमुख जिलों अल्मोड़ा, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ आदि में लेख व गुहा चित्र मिले है। 

अल्मोड़ा (Almora)

अल्मोड़ा जनपद के निम्नलिखित स्थानों से हमें प्रागैतिहासिक काल के बारे में जानकारी मिलती हैं – 

लाखू उडुयार (लाखू गुफा)

  • स्थान – अल्मोड़ा (सुयाल नदी के तट पर बसे दलबैंड, बाड़ेछीना गाँव में।)
  • खोज – 1968 ई०
  • खोजकर्ता – श्री यशवंत सिंह कठौर और एम.पी. जोशी 
  • उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्रों की पहली खोज थी।
  • लखुउडियार का हिन्दी में अर्थ हैं ‘लाखों गुफायें’ अर्थात इस जगह के पास कई अन्य गुफायें भी हैं।
  • विशेषताएं –
    • मानव आकृतियों का अकेला व समूह में नृत्य करते हुए।
    • विभिन्न पशु पक्षियों का चित्रण किया गया है।
    • चित्रों को रंगों से सजाया गया है।
    • इन शैलचित्रों में भीमबेटका-शैलचित्र के समान समरूपता देखी गयी है।

ल्वेथाप गाँव 

  • स्थान – अल्मोड़ा जिले में
  • विशेषताएं
    • शैल-चित्रों में मानव को हाथो में हाथ डालकर नृत्य करते तथा शिकार करते दर्शाया गया हैं।
    • यहाँ से लाल रंग से निर्मित चित्र प्राप्त हुए है।

पेटशाला

  • स्थान – अल्मोड़ा जिले में (पेटशाला व पुनाकोट गाँव के बीच स्थित कफ्फरकोट में)
  • खोज – 1989 ई०
  • खोजकर्ता – श्री यशोधर मठपाल  
  • विशेषताएं –
    • शैल-चित्रों में नृत्य करते हुए मानवों की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।
    • मानव आकृतियां रंग से रंगे है।

फलसीमा

  • स्थान – अल्मोड़ा के फलसीमा में
  • विशेषताएं –
    • मानव आकृतियों में योग व नृत्य करते हुए दिखाया गया हैं।

कसार देवी मंदिर 

  • स्थान – अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूर कश्यप पहाड़ी की चोटी पर
  • विशेषताएं –
    • इस मंदिर से 14 मृतकों का सुंदर चित्रण प्राप्त हुआ है।

चमोली (Chamoli)

चमोली जनपद के निम्नलिखित स्थानों से हमें प्रागैतिहासिक काल के बारे में जानकारी मिलती हैं – 

गवारख्या गुफा

  • स्थान – चमोली जनपद में (अलकनंदा नदी के किनारे डुग्री गाँव के पास स्थित।)
  • खोजकर्ता – श्री राकेश भट्ट, इसका अध्ययन डॉ. यशोधर मठपाल ने किया। 
  • विशेषताएं –
    • इस उड्यार में मानव, भेड़, बारहसिंगा आदि के रंगीन चित्र मिले हैं।
    • यहाँ प्राप्त शैल-चित्र लाखु गुफा के चित्रों (मानव, भेड़, बारहसिंगा, लोमड़ी) से अधिक चटकदार है।
    • डॉ. यशोधर मठपाल के अनुसार इन शिलाश्रयों में लगभग 41 आकृतियाँ है, जिनमें  30 मानवों की, 8 पशुओं की तथा 3 पुरुषों की है।
    • चित्रकला की दृष्टि से उत्तराखंड की सबसे सुंदर आकृतियां मानी जाती है।
    • चित्रों की मुख्य विशेषता मनुष्यों द्वारा पशुओं को हाँकते हुए और घेरते हुए दर्शाया गया है।

किमनी गाँव 

  • स्थान – चमोली जनपद के थराली विकासखंड में
  • विशेषताएं –
    • हथियार व पशुओं के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं ।
    • हल्के सफेद रंग का प्रयोग किया गया है।

मलारी गाँव

  • स्थान – तिब्बत से सटा मलारी गांव चमोली में। 
  • खोजकर्ता – 2002 में गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन।
  • विशेषताएं –
    • हजारों वर्ष पुराने नर कंकाल मिट्टी के बर्तन जानवरों के अंग प्राप्त हुए।
    • 2 किलोग्राम का एक सोने का मुखावरण (Gold Mask) प्राप्त हुआ।
    • नर कंकाल और मिट्टी के बर्तन लगभग 2000 ई०पू० से लेकर 6 वीं शताब्दी ई०पू० तक के हो सकते है।
    • डॉ. शिव प्रसाद डबराल द्वारा गढ़वाल हिमालय के इस क्षेत्र में शवाधान खोजे गए है।
    • यहाँ से प्राप्त बर्तन पाकिस्तान की स्वात घाटी के शिल्प के समान है।
मलारी गांव में गढ़वाल विश्विद्यालय के खोजकर्ताओं ने दो बार सर्वेक्षण किया – 

  • गढ़वाल विश्विद्यालय के खोजकर्ताओं को मानव अस्थियों के साथ लोहित, काले एवं धूसर रंग के चित्रित मृदभांड प्राप्त हुए।
  • प्रथम सर्वेक्षण 1983 में आखेट के लिए प्रयुक्त लोह उपकरणों के साथ एक पशु का संपूर्ण कंकाल मिला जिसकी पहचान हिमालय जुबू से की गई व साथ ही कुत्ते भेड़ व बकरी की अस्थियां प्राप्त हुई।
  • द्वितीय सर्वेक्षण (2001-02) में नर कंकाल के साथ 5.2 किलो का स्वर्ण मुखौटा (मुखावरण), कांस्य कटोरा व मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए।

उत्तरकाशी (Uttarkashi)

हुडली

  • स्थान – उत्तरकाशी में
  • विशेषताएं –
    • यहां नीले रंग के शैल चित्र प्राप्त हुए।

पिथौरागढ़ (Pithoragarh)

बनकोट

  • स्थान – पिथौरागढ़ के बनकोट क्षेत्र से
  • विशेषताएं –
    • 8 ताम्र मानव आकृतियां मिली हैं।

चंपावत (Champawat) 

देवीधुरा की समाधियाँ 

  • स्थान – चंपावत जिले में
  • खोज – 1856 में हेनवुड द्वारा
  • विशेषता
    • बुर्जहोम कश्मीर के समान समाधियाँ।

 

 

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उत्तराखंड राज्य के प्रमुख दिवस

उत्तराखंड राज्य के प्रमुख दिवस
(Major days of Uttarakhand state)

25 मई  – राज्य जल दिवस 

5 जुलाई – हरियाली दिवस 

12 अगस्त – प्रेरणा दिवस (नरेन्द्र सिंह नेगी के जन्मदिवस) 

1 सितम्बर – कुमाऊँनी बोली दिवस 

2 सितम्बर – गढ़वाली बोली दिवस 

9 सितम्बर – हिमालय दिवस 

10 सितम्बर – उत्तराखण्ड़ गौरव दिवस (भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पंत के जन्म दिवस) 

17 सितम्बर – जागर संरक्षण दिवस (जागर गायक प्रीतम भरत्वाण के जन्म दिवस) 

19 सितम्बर – उत्तराखण्ड साहित्य दिवस (साहित्यकार हरिदत भट्ट के जन्म दिवस) 

4 अक्टूबर – हाथी दिवस 

9 नवम्बर – राज्य स्थापना दिवस 

11 दिसम्बर – पहाड़ दिवस 

17 दिसम्बर – गंगा स्वच्छता दिवस 

24 दिसम्बर – लोक संस्कृति दिवस (उत्तराखण्ड के गांधी इन्द्रमणी बड़ोनी के जन्म दिवस) 

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उत्तराखंड की मृदा (Soil of Uttarakhand)

अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में उत्तराखंड में आई आपदा में मिट्टी कटान सबसे ज्यादा था। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में कुछ सालों से बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो मिट्टी कटान की घटनाओं को बढ़ावा दे रहा है। 2017 में तैयार किए गए आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 24295 वर्ग किलोमीटर जंगल का क्षेत्र है, जो प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 45.43 फीसद है। उत्तराखंड की भूमि संरचना को देखते हुए, भूमि को तीन भागों में बांटा गया है। जो निम्न प्रकार से है –

उत्तराखंड में पायी जाने वाली मिट्टी 

1. तालाब / नदी घाटी की भूमि

  • उत्तराखंड में नदियां अपने प्रवाह मार्ग के सहारे विशाल उर्वरक मैदानों का निर्माण करती है।
  • इन मैदानों में सिंचाई सुविधा भी उपलब्ध होती है। मिट्टी उपजाऊ होने के कारण यहां पर गेहूं, धान की खेती की जाती है।
  • यह मध्यम कृषि क्षेत्र वाला प्रदेश है। और उत्तराखंड में सिंचित भूमि कोतलाव कहा जाता है।

 2. मैदानी भागों की भूमि

  • इसमें संपूर्ण तराई भाबर क्षेत्र आता है। जिसमें देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर एवं नैनीताल का कुछ भाग आता है।
  • यहां पर समतल एवं उर्वरक मैदान है। तथा इन मैदानों में कृषि सर्वाधिक विकसित अवस्था में मिलती है।
  • इन क्षेत्रों मेंगेहूं, धान, गन्ना एवं दलहनी फसलों का उत्पादन अधिक होता है।

3. पर्वतीय ढाल युक्त भूमि / उखड

  • उत्तराखंड में पहाड़ों पर सीढ़ीदार खेती होती है।
  • सिंचित भूमि ना होने के कारण स्थानीय भाषा में इसे उखड़ कहा जाता है। यह कृषि वर्षा पर आधारित होती है।
  • जिस कारण उत्पादन कम तथा अनियंत्रित होता है। इसलिए वर्तमान में लोग कृषि कार्यों को छोड़कर अन्य व्यवसायों में संलग्न हो गए हैं।
  • ICAR (दिल्ली भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) ने उत्तराखंड की मिट्टी को पर्वतीय या वनीय मिट्टी कहा है।

मिट्टी के संगठन के आधार पर उत्तराखंड में निम्न प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं –

1. तराई मिट्टी

  • राज्य के सबसे दक्षिणी भाग में देहरादून के दक्षिणी सिरे से ऊधम सिंह नगर तक महिन कणों के निक्षेप से निर्मित तराई मृदा पाई जाती हैं।
  • राज्य की अन्य मिट्टियों की अपेक्षा यह अधिक परिपक्व तथा नाइट्रोजन एवं फास्फोरस की कमी वाली मृदा है।
  • यह मृदा समतल, दलदली, नम और उपजाऊ होती है।
  • इस क्षेत्र में गन्ने एवं धान की पैदावार अच्छी होती है।

2. भाबर मिट्टी

  • भाबर मृदा तराई के उत्तर और शिवालिक के दक्षिण यह मृदा पाई जाती है।
  • हिमालयी नदियों के भारी निक्षेपों से निर्मित होने के कारण यह मिट्टी कंकड़ों-पत्थरों तथा मोटे बालुओं से निर्मित है।
  • यहां पर मिट्टी पथरीली एवं कंकड़ पत्थर से युक्त होती है, जिस कारण जल नीचे चला जाता है।
  • यह मृदा कृषि के लिए अनुपयुक्त है।
  • पानी की कमी के कारण यह अनउपजाऊ होती है।

3. चारगाही मिट्टी

  • ऐसी मृदाएं निचले भागों में जलधाराओं के निकट नदियों एवं अन्य जल प्रवाहों के तटवर्ती क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • इस मृदा को निम्न पांच भागों में विभक्त किया जा सकता है –
    1. मटियार दोमट (भूरा रंग, नाईट्रोजन तथा जैव पदार्थ अधिक एवं चूना कम)
    2. अत्यधिक चूनेदार दोमट
    3. कम चूनेदार दोमट
    4. गैर चूनेदार दोमट
    5. बलुई दोमट

4. टर्शियरी मिट्टी

  • ये मिट्टी शिवालिक की पहाड़ियों तथा दून घाटियों में पायी जाती है जोकि हल्की, बलुई एवं छिद्रमय अर्थात् आद्रता को कम धारण करती है।
  • इसमें वनस्पति एवं जैव पदार्थ की मात्रा कम होती है। लेकिन दून घाटी के मिट्टी में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा वनस्पति के अंश की अधिकता तथा आर्द्रता धारण करने की क्षमता अधिक होती है।
  • ये शिवालिक एवं दून घाटी में पाई जाती है।

5. क्वाटर्ज मिट्टी

  • यह मिट्टी नैनीताल के भीमताल क्षेत्र में पायी जाती है।
  • आद्य, पुरा एवं मध्य कल्प के क्रिटेशियस युग में निर्मित शिष्ट, शेल, क्वार्ट्ज आदि चट्टानो के विदीर्ण होने से इसका निर्माण हुआ है।
  • यह मिट्टी हल्की एवं अनुपजाऊ होती है।
  • इसे क्वार्ट्ज मृदा कहा जाता है।

6. ज्वालामुखी मिट्टी

  • नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र में यह मिट्टी पायी जाती है।
  • आग्नेय चट्टानों के विदीर्ण होने से निर्मित यह मिट्टी हल्की एवं बलुई है तथा कृषि कार्य के लिए उपयुक्त है।
  • इस प्रकार की मृदा को ज्वालामुखी मिट्टी कहा जाता है।

7. दोमट मिट्टी

  • शिवालिक पहाड़ियों के निचले ढालों तथा दून घाटी में सहज ही उपलब्ध इस मिट्टी में हल्का चिकनापन के साथ- साथ चूना, लौह अंश और जैव पदार्थ विद्यमान रहते हैं।
  • दोमट मिट्टी दून घाटी में पाई जाती है।
  • इसमें चूना तथा लौह अंश की अधिकता होती है।

8. भूरी लाल पीली मिट्टी

  • नैनीताल, मंसूरी व चकरौता के निकट चूने एवं बलुवा पत्थर, शेल तथा डोलोमाइट चट्टानों से निर्मित यह मृदा पाई जाती है।
  • इसका रंग भूरा, लाल अथवा पीला होता है।
  • ऐसा धरातलीय चट्टानों एवं वानस्पतिक अवशेषों के होता है।
  • यह मृदा अधिक आद्रता ग्राही और उपजाऊ होती है।

9. लाल मिट्टी

  • यह मिट्टी अधिकांशतः पहाड़ों की ढालों या पर्वतों के किनारे पायी जाती है।
  • यह मिट्टी असंगठित होती है।

10. वनों की भूरी मिट्टी

  • वन की भूरी मिट्टी यह मिट्टी उत्तराखण्ड के अधिकांश वनीय भागों में पायी जाती है।
  • इसमें जैव तत्व की अधिकता तथा चूना व फास्फोरस की कमी होती है।

11. भस्मी मिट्टी

  • यह मिट्टी कम ढालू स्थानों, पर्वत श्रेणियों के अंचलों तथा उप-उष्ण देशीय एवं समशीतोष्ण सम्भगों में पायी जाती है।

12. उच्चतम पर्वतीय छिछली मिट्टी

  • यह मृदा कम वर्षा वाले उच्च पहाड़ी भागों में मिलती है।
  • अत्यधिक शुष्कता तथा वनस्पति के अभाव के कारण यह बिल्कुल अपरिपक्व होती है।
  • इसकी परत पतली होती है।

13. उच्च मैदानी मिट्टी

  • यह मिट्टी सामान्यतः 4000 km से अधिक ऊंचाई पर पाई जाती है।
  • शुष्क जलवायु, वायु अपक्षय तथा हिमानी अपरदन के प्रभाव के कारण इन मिट्टियो में प्रायः नमी की कमी पायी जाती है।
  • यह हल्की क्षारीय तथा कार्बनिक पदार्थों के उच्च मात्रा से युक्त होती है। 
  • चट्टानी टुकड़ों तथा अन्य प्रदूषित पदार्थों के मिश्रण के कारण इस मिट्टी के गठन एवं संरचना में विभिन्नता आ जाती है।
  • इन्हें एल्पाइन चारागाह (पाश्चर्स) मृदा भी कहते है।

 

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उत्तराखण्ड : जिला दर्पण eBook

उत्तराखण्ड : जिला दर्पण

प्रस्तुत पुस्तिका में उत्तराखण्ड के समस्त 13 जनपदों का संक्षिप्त ब्योरा दिया गया है। जिसमे सभी जनपदों के भौगोलिक, राजनैतिक एवं जनसँख्या के आकड़ों को प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक उत्तराखण्ड के विभिन्न परीक्षाओं (UKSSSC, UKPSC, UBTER, etc) की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

उत्तराखण्ड : जिला दर्पण (Uttarakhand : District Series)

उत्तराखण्ड : जिला दर्पण  के इस अंक में दिया गया है – 

  • जनपद का नामकरण
  • जनपद का संक्षिप्त इतिहास
  • जनगणना
  • जनपद का भूगोल
  • जनपद की प्रमुख तालें / कुण्ड
  • जनपद के प्रमुख मंदिर
  • जनपद के प्रमुख मेले
  • जनपद की प्रमुख नदियां
  • जनपद प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं
  • जनपद के प्रमुख स्थल

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उत्तराखण्ड : जिला दर्पण (Uttarakhand : District Series) Book

 

Uttarakhand : District Series Book

उत्तराखण्ड : जिला दर्पण (Uttarakhand : District Series)
Language – Hindi (हिंदी)

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उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक संस्थाएँ व उनका गठन

उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक संस्थाएँ, उनका गठन व उद्देश्य
(Cultural Institutions of Uttarakhand, their Formation and Objectives)

संस्थान  गठन (वर्ष)  उद्देश्य
श्रीराम सेवक सभा, नैनीताल 1918 नन्दादेवी और रामलीला आयोजन हेतु। 
भातखण्डे संगीत महाविद्यालय 1926 भारतीय शास्त्रीय संगीत की विद्या को बढ़ावा देना, इसके अन्तर्गत – देहरादून, अल्मोड़ा और पौड़ी में तीन महाविद्यालयों की स्थापना की गई।
श्री हरि कीर्तन सभा, नैनीताल 1940 शास्त्रीय एवं वाद्य संगीत में प्रशिक्षण, लोकनृत्य एवं लोकनाट्य के विकास को बढ़ावा देना। 
बोट हाउस क्लब, नैनीताल 1948 डोंगी की दौड़, नावों की दौड़, नृत्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना।
संस्कृत कला केन्द्र, हल्द्वानी 1957 पारम्परिक भारतीय संगीत एवं नाटक को लोकप्रिय बनाना।
पर्वतीय कला केन्द्र, दिल्ली 1968 प्रदेश के कलाकारों को सहयोग एवं प्रशिक्षण उपलब्ध कराना।
रंगमण्डल, देहरादून एवं अल्मोड़ा 2000 नाट्य एवं लोक कला और कलाकारों को बढ़ावा देना।
नाट्य एवं संगीत अकादमी, अल्मोड़ा 2002 नाट्य एवं संगीत को बढ़ावा देना और उसके विकास में सहायता करना।
उदयशंकर नृत्य व नाट्य अकादमी, अल्मोड़ा 2003 नृत्य एवं नाट्य क्षेत्र को बढ़ावा देना।
संस्कृति, साहित्य एवं कला परिषद्, देहरादून 2004 प्रदेश के सांस्कृतिक विकास, संरक्षण एवं प्रोत्साहन हेतु।
जयराम आश्रम संस्कृत महाविद्यालय, हरिद्वार 2005 अकादमिक स्तर की शिक्षा को बढ़ाना, विशेषकर संस्कृत का विकास करना।
हिमालयन सांस्कृतिक केन्द्र, देहरादून 2010 प्रदेश के सांस्कृतिक विरासत को आधुनिकता प्रदान करना और उसके विकास को बढ़ावा देना। 

 

 

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उत्तराखंड एक जिला दो उत्पाद

उत्तराखंड एक जिला दो उत्पाद योजना के अंतर्गत हर जिले के दो प्रमुख उत्पादों को बढ़ावा दिया जाएगा। इस उत्पादों की सूची इस प्रकार है – 

उत्तराखंड एक जिला दो उत्पाद
(Uttarakhand One District Two Products)

जनपद चयनित उत्पाद
हरिद्वार गुड़ और शहद
उत्तरकाशी  सेब आधारित उत्पाद और ऊनी हस्तशिल्प उत्पाद
देहरादून बेकरी उत्पाद और मशरूम
नैनीताल ऐपण क्राफ्ट और कैंडल क्राफ्ट
चंपावत  लौह उत्पाद और हाथ से बुने उत्पाद
पौड़ी गढ़वाल हर्बल उत्पाद और वुडन फर्नीचर 
पिथौरागढ़ ऊनी कारपेट और मुनस्यारी राजमा
उधम सिंह नगर मेंथा आयल और मूंज ग्रास प्रोडक्ट 
अल्मोड़ा  ट्वीड और बाल मिठाई 
बागेश्वर तांबे के उत्पाद और मंडुआ बिस्कुट
टिहरी गढ़वाल नेचुरल फाइबर उत्पाद और टिहरी नथ
चमोली हथकरघा एवं हस्तशिल्प और एरोमेटिक हर्बल
रुद्रप्रयाग मंदिर अनुकृति हस्तशिल्प और प्रसाद उत्पाद

 

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नशा नहीं रोजगार दो (Not Intoxicated Give Employment)

उत्तराखण्ड में गोरखा के शासन काल तक शराब का कोई प्रचार-प्रसार नहीं था। उत्तराखंड में कई जनजातियाँ में शराब परम्परागत रुप से जुड़ी होने के बावजूद भी शराब का प्रचलन बहुत कम था। उत्तराखण्ड में ब्रिटिश काल में 1880 के बाद सरकारी शराब की दुकानें खुलने के साथ ही यहां पर शराब का प्रचलन शुरु हुआ। 1882 में जब यह कहा जाने कि यहां पर शराब का प्रचलन बढ़ने लगा है तो तत्कालीन कमिश्नर रामजे ने लिखा था कि “ग्रामीण क्षेत्रों में शराब का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता है और मुझे आशा है कि यह कभी नहीं होगा, मुख्य स्टेशनों के अलावा शराब की दुकानें अन्यत्र खुलने नहीं दी जायेंगी”। 

अल्मोड़ा अखबार 2 जनवरी, 1893 ने लिखा “जो लोग शराब के लती हैं, वे तुरन्त ही अपना स्वास्थ्य व सम्पत्ति खोने लगते हैं, यहां तक कि वे चोरी, हत्या तथा अन्य अपराध भी करते हैं, सरकार को लानत है कि वह सिर्फ आबकारी रेवेन्यू की प्राप्ति के लिये इस तरह की स्थिति को शह दे रही है। यह सिफारिश की जाती है कि सभी नशीले पेय और दवाओं पर पूरी तरह रोक लगे।”

स्वतंत्रता संग्राम में देश के अन्य भागों की तरह यहां पर भी शराब के खिलाफ आन्दोलन चलते रहे, 1965 – 67 में सर्वोदय कार्यकर्ताओं द्वारा टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ तक शराब के विरोध में आन्दोलन चलाया, परिणाम स्वरुप कई शराब की भट्टियां बंद कर दी गईं।

1 अप्रैल, 1969 को सरकार ने उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ में शराबबंदी लागू कर दी। 1970 में टिहरी और पौड़ी गढ़वाल में भी शराबबंदी कर दी गई, पर 14 अप्रैल, 1971 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस शराबबंदी को अवैध घोषित कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार मे उच्च्तम न्यायालय में इसके विरुद्ध कुछ करने के बजाय या आबकारी कानून में यथोचित परिवर्तन करने के फौरन शराब के नये लाइसेंस जारी कर दिये। जनता ने इसका तुरन्त विरोध किया। सरला बहन जैसे लोग आगे आये और 20 नवम्बर, 1971 को टिहरी में विराट प्रदर्शन हुआ, गिरफ्तारियां हुई। अन्ततः सरकार ने झुक कर अप्रैल, 1972 से पहाड के पांच जिलों में फिर से शराबबंदी कर दी।

कच्ची शराब कुटीर उद्योग के रुप में फैल चुकी है, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली आदि जनपदों में भोटियाँ जनजातियों के अधिकांश लोगों ने तिब्बत से व्यापार बन्द होने के बाद कच्ची शराब के धन्धे को अपना मुख्य व्यवसाय बना लिया था। इस धन्धे को बखूबी चलने देने के लिये वे पुलिस व आबकारी वालों की इच्छानुसार पैसा खिलाते थे। कच्ची के धन्धे को नेपाल से भारत में आकर जंगलों, बगीचों आदि में काम करने वाले नेपाली मजदूर भी खूब चलाते थे।

1978 में जनता पार्टी का शासन होने पर उत्तर प्रदेश ने आठों पर्वतीय जनपदों में पूर्ण मद्यनिषेध लागू कर दिया था, पर सरकारी तंत्र में शराब बंदी के प्रति कोई आस्था न होने के परिणामस्वरुप शराब बंदी के स्थान पर पहाड़ के गांवों में सुरा, लिक्विड आदि मादक द्रव्य फैल गये और पहाड़ की बर्बादी का एक नया व्यापार शुरु हो गया।

जनवरी 1984 में “जागर” की सांस्कृतिक टोली ने भवाली से लेकर श्रीनगर तक पदयात्रा की और सुरा-शराब का षडयंत्र जनता को समझाया। 1 फरवरी, 1984 को चौखुटिया में जनता ने आबकारी निरीक्षक को अपनी जीप में शराब ले जाते पकड़ा और इसके खिलाफ जनता का सुरा-शराब के पीछे इतने दिनों का गुस्सा एक साथ फूट पड़ा। एक आंदोलन की शुरुआत हुई, 2 फरवरी, 1984 को ग्राम सभा बसभीड़ा में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी ने एक जनसभा में इस आंदोलन की प्रत्यक्ष घोषणा कर दी। फरवरी के अंत में चौखुटिया में हुये प्रदर्शनों में 5 से 20 हजार जनता ने हिस्सेदारी की।

इसके बाद आंदोलन असाधारण तेजी से समूचे पहाड़ में फैला, जगह-जगह जनता ने सुरा-शराब के अड्डों पर छापा मारा या सड़को-पुलों पर जगह-जगह गाड़ी रोक कर करोड़ों रुपयों की सुरा-शराब पकड़वाई। इस जहरीले व्यापार में लिप्त लोगों का मुंह काला किया गया, प्रदर्शन, नुक्कड़ नाटक, सभायें होती रहीं। महिलाओं ने निडर होकर घर से बाहर निकलना शुरु किया। पहाड़ के ताजा इतिहास में शायद पहली बार किसी आंदोलन में महिलाओं को इतना समर्थन मिला, क्योंकि सुरा-शराब से सबसे ज्यादा महिलायें प्रभावित हो रहीं थीं।

इस बीच पर्यटन की आड़ लेकर सुरा-शराब लाबी ने नैनीताल में आंदोलन का अप्रत्यक्ष रुप से विरोध शुरु करवा दिया। लेकिन इसके विरोध में 17 जून, 1984 को मूसलाधार वर्षा के बीच उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के आह्वान पर एक ऐतिहासिक प्रदर्शन नैनीताल में हुआ, जिसमें ढोल-नगाड़ों, निशाणों के साथ पहाड़ के कोने-कोने से आये हजारों लोगों ने भागीदारी दी।

उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी इन दिनों, सुरा, बायोटानिक जैसे 10 प्रतिशत से अधिक नशीले द्रव्यों के खिलाफ लाखों लोगों के हस्ताक्षर लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है और साथ ही जहां-जहां सम्भव हो, नगरों में, देहात में, मेलों में, लोक शिक्षण का कार्यक्रम भी चला रही है।

उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी इस आंदोलन को सिर्फ सुरा-शराब के खिलाफ लड़ाई बनाकर नहीं रखना चाहती, इनके मुख्य नारे इस प्रकार थे : – 

‘शराब आन्दोलन’ के घोष वाक्य  – 

“शराब नहीं रोजगार दो”,

“कमाने वाला खायेगा-लूटने वाला जायेगा”,

“फौज-पुलिस-संसद-सरकार, इनका पेशा अत्याचार” 

 

 

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कार्तिकेयपुर राजवंश का इतिहास (History of Kartikeypur Dynasty)

कार्तिकेयपुर राजवंश (700 ई०) (Kartikeypur Dynasty 700 AD)

  • स्थापना – 700 ई.
  • उत्तराखंड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश
  • संस्थापक – बसन्तदेव
  • प्रथम राजधानी – जोशीमठ (चमोली)
  • राजधानी स्थानांतरित – बैजनाथ (बागेश्वर) के पास बैधनाथ-कार्तिकेयपुर (कत्यूर घाटी)।
  • स्रोत – बागेश्वर, कंडारा, पांडुकेश्वर, एवं बैजनाथ आदि स्थानो से प्राप्त ताम्र लेख।
  • देवता – कार्तिकेय
  • वास्तुकला तथा मूर्तिकला के क्षेत्र में यह उत्तराखंड का स्वर्णकाल था।
  • इस राजवंश को उत्तराखंड व मध्य हिमालयी क्षेत्र का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है।
  • इतिहासकार लक्ष्मीदत्त जोशी के अनुसार कार्तिकेयपुर के राजा मूलतः अयोध्या के थे।
  • इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे के अनुसार कार्तिकेयपुर के राजा सूर्यवंशी थे।

कार्तिकेयपुर राजवंश के परिवार

1. बसंतदेव का राजवंश (कार्तिकेयपुर का प्रथम परिवार)

  • संस्थापक – बसन्तदेव था।
  • स्रोत – बागेश्वर त्रिभूवन राज शिलालेख
  • उपाधि – परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर
  • यह कार्तिकेयपुर राजवंश के प्रथम शासक था।
  • बसन्तदेव ने बागेश्वर समीप एक मंदिर को स्वर्णेश्वर नामक ग्राम दान में दिया था।
  • बागेश्वर, कंडारा, पांडुकेश्वर, एवं बैजनाथ आदि स्थानो से प्राप्त ताम्र लेखों से इस राजवंश के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है। 

2. खपरदेव वंश 

  • खर्पर देव वंश का विवरण बागेश्वर लेख में मिलता है।
  • खपरदेव वंश की स्थापना खर्परदेव ने की जो कि कार्तिकेयपुर में बसंतदेव के बाद तीसरी पीढ़ी का शासक था।
  • इसका पुत्र कल्याण राज था।
  • खर्परदेव वंश का अंतिम शासक त्रिभुवन राज था। 

3. निम्बर वंश (कार्तिकेयपुर का द्वितीय परिवार)

  • संस्थापक – निम्बर देव
  • निम्बर वंश का सर्वाधिक उल्लेख – पांडुकेश्वर (जोशीमठ) के ताम्रपत्र में मिलता हैं।
  • पांडुकेश्वर ताम्रपत्र की भाषा – संस्कृत

निम्बर वंश में निम्न शासक हुए – 

1. निम्बर – यह निम्बर वंश का संस्थापक था। इसे शत्रुहन्ता भी कहा गया है।

2. इष्टगण – इसने समस्त उत्तराखंड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया व कार्तिकेयपुर राज्य की सीमाओं को वर्तमान गढ़वाल कुमाँऊ तक विस्तारित किया।

3. ललितशूर देव

  • यह एक महान निर्माता था।
  • इन सभी राजाओं में सर्वाधिक ताम्रपात्र ललितसुरदेव के प्राप्त हुए।
  • पांडुकेश्वर के ताम्रपत्र में इसे कालिकलंक पंक में मग्न धरती के उद्धार के लिये बराहवतार बताया गया

4. भूदेव –

  • ललितसूरदेव का पुत्र भू-देव निम्बर वंश का अंतिम शासक था।
  • इसने बैजनाथ मंदिर के निर्माण में सहयोग किया।
  • बैजनाथ मंदिर बागेश्वर जिले के गरुड़ तहसील में स्थित है।
  • यह मंदिर 1150 ई० में बनाया गया।

4. सलोड़ादित्य वंश (कार्तिकेयपुर का तीसरा परिवार) 

  • तालेश्वर एवं पांडुकेश्वर के ताम्रपत्र लेखों से ज्ञात होता है कि निम्बर वंश के बाद कार्तिकेयपुर में सलोड़ादित्य वंश के शासन का वर्णन मिलता है।
  • सलोड़ादित्य वंश की स्थापना सलोड़ादित्य के पुत्र इच्छरदेव ने की।
  • इच्छरदेव के बाद इस वंश में देसतदेव, पदमदेव, सुमिक्षराजदेव आदि शासक हुए।
  • सुभिक्षराजदेव के बाद उसके किसी वंशज ने राजधानी कार्तिकेयपुर से कुमाँऊ के गोमती घाटी (कत्यूर घाटी) में स्थानांतरित की, जिसे बैजनाथ शिलालेख में वैधनाथ कार्तिकेयपुर कहा गया है।

शंकराचार्य का उत्तराखण्ड आगमन

  • शंकराचार्य भारत के महान दार्शनिक व धर्मप्रवर्तक थे।
  • शकराचार्य का आगमन उत्तराखंड में कार्तिकेयपुर राजवंश के शासन काल मे हुआ।
  • शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म की पुनः स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी –
    (1) ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम)
    (2) श्रृंगेरी मठ
    (3) द्वारिका शारदा पीठ
    (4) पुरी गोवर्धन पीठ
  • सन 820 ई० में इन्होंने केदारनाथ में अपने शरीर का त्याग कर दिया था।

कार्तिकेयपुर (कत्यूरी राजवंश राज्य प्रशासन)

पदाधिकारी

  • प्रान्तपाल – सीमाओ की सुरक्षा
  • घट्टपाल – गिरीद्वारों का रक्षक
  • वर्मपाल – सीमावर्ती भागों में आने जाने वाले व्यक्ति पर निगाह रखता था
  • नरपति – नदी घाटों पर आगमन की सुविधा व कर वसूली

सेना व सैन्यधिकारी

सेना सेना नायक
1. पदातिक सेना  गोल्मीक
2.अश्वारोही सेना  अश्वाबलाधिकृत
3. गजारोगी सेना  हस्तिबलाधिकृत
4. उष्ट्रारोहि सेना  उष्ट्रबलाधिकृत 
तीनों आरोही सेना का सर्वोच्च पदाधिकारी – हस्त्यासवोष्ट्रबलाधिकृत

 

पुलिस विभाग के अधिकारी 

  • दोषापराधिक – अपराधी को पकड़ने वाला
  • दुःसाध्यसाधनिक – गुप्तचर विभाग का अधिकारी
  • चोरोद्वरणिक – चोर डाकुओं को पकड़ने वाला

 

कृषि से सम्बंधित अधिकारी 

  • आय साधन – कृषि व वन
  • क्षेत्रपाल – कृषि की उन्नति का ध्यान रखने वाला
  • प्रभातार – भूमि की नाप
  • उपचारिक – भूमि के अभिलेख रखने वाला
  • खण्डपति – वनों की रक्षा करने वाला

 

कर अधिकारी 

  • भोगपति – कर वसूली करने वाला
  • भट्ट और चार – प्रसार – प्रजा से बेगार लेने वाला

 

शासन-प्रशासन

  • राज्य – राजा
  • प्रान्त – उपरिक
  • जिले – विषपति

 

 

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UKSSSC (वाहन चालक, प्रवर्तन चालक, डिस्पैच राइडर) Exam 12 June 2022 (Answer Key)

उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC – Uttarakhand Subordinate Service Selection Commission) द्वारा उत्तराखंड समूह ‘ग’ के अंतर्गत (वाहन चालक, प्रवर्तन चालक, डिस्पैच राइडर) की भर्ती परीक्षा का आयोजन दिनांक 12 जून, 2022 को किया गया। इन परीक्षा का प्रश्नपत्र उत्तर कुंजी (Exam Paper With Answer Key) सहित यहाँ पर उपलब्ध है।

UKSSSC (Uttarakhand Subordinate Service Selection Commission) organized the Uttarakhand Driver, Enforcement Driver, Dispatch Rider Exam Paper held on 12th June 2022. This Exam Paper (UKSSSC Driver) 2022 Question Paper with Answer Key.

पद नाम वाहन चालक, प्रवर्तन चालक, डिस्पैच राइडर
पद कोड  715/788, 152 To 159, 162, 634, 679, 399/664, 154/440
परीक्षा तिथि 12 June, 2022 (10:00 AM – 11:00 AM)
प्रश्नों की कुल संख्या 50
पेपर सेट C

UKSSSC (Driver, Enforcement Driver, Dispatch Rider) Exam Paper 2022
(Answer Key)

1. द्वाराहाट मन्दिर समूह बनवाया गया :
(A) कुणिन्द राजाओं के द्वारा

(B) कत्यूरी राजाओं के द्वारा
(C) चन्द राजाओं के द्वारा
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (B)

2. इंजन में कैम शाफ्ट लगी रहती है :
(A) ऊक शाफ्ट की ओर झुका
(B) क्रैंक शाफ्ट के लम्बवत
(C) क्रैंक शाफ्ट के समानांतर
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (*)

3. उत्तराखण्ड की डॉ० माधुरी बड़थ्वाल को 2022 ई० में सम्मानित किया गया :
(A) साहित्य अकादमी पुरस्कार से
(B) पद्म विभूषण पुरस्कार से
(C) पद्मश्री पुरस्कार से
(D) पद्म भूषण पुरस्कार से

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Answer – (C)

4. निम्न में से कौन भारत में ‘ऑफ रोड कार रैली’ चालक नहीं है ?
(A) चेतन शिवराम
(B) डॉ० बिक्कू बाबू
(C) विक्कू विनायक्रम
(D) गौरव गिल

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Answer – (*)

5. नीचे दिये गये आज्ञापक संकेत का अर्थ है :
UKSSSC (Driver, Enforcement Driver, Dispatch Rider) Exam Paper 2022 Answer Key
(A) आगे चलना या दाएं मुड़ना अनिवार्य

(B) पहले दाएं मुड़ना फिर आगे चलना अनिवार्य
(C) पहले आगे चलना फिर दाएं मुड़ना अनिवार्य
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (*)

6. उत्तराखण्ड में ‘प्रजामण्डल आन्दोलन’ प्रारम्भ किया था :
(A) दौलत राम ने
(B) मोलू भरदारी ने
(C) नागेन्द्र सकलानी ने
(D) श्री देव सुमन ने

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Answer – (D)

7. ‘तम्बाकू निषध दिवस’ होता है
(A) 31 मई को
(B) 30 मई को
(C) 30 जून को
(D) 31 जुलाई को

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Answer – (A)

8. अर्जुन अवार्ड से सम्मानित श्री सुरेन्द्र सिंह कनवासी किस क्षेत्र से सम्बन्धित हैं?
(A) लेखन
(B) पर्यावरण
(C) नौकायन
(D) पर्वतारोहण

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Answer – (C)

9. ऑटोमोबाइल में बैटरी का मुख्य कार्य है।
(A) विद्युत के स्टेबलाइजर के रूप में का करना
(B) इंजन के चलने के दौरान हर समय प्रणाली को विद्युत की आपूर्ति करना
(C) इंजन स्टार्ट करते समय स्टार्टर मोटर को चालू करने के लिए अत्यधिक मात्रा में विद्युत की आपूर्ति करना
(D) अल्टरनेटर को विद्युत की आपूर्ति

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Answer – (*)

10. एक दिशा में तीन लेन वाले कैरिज-वे (परिवहन मार्ग) पर भारी वाहन किस लेन पर चलाया जाएगा?
(A) बायीं लेन में
(B) मध्य लेन में
(C) दायीं लेन में
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (*)

11. ‘कटारमल के सूर्य मन्दिर’ का निर्माण किस युग/काल में हुआ?
(A) शुग युग
(B) मौर्य काल
(C) कत्यूरी काल
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (C)

12. एक व्यक्ति, जिसे वाहन चलाने की वैध अनुज्ञप्ति जारी नहीं की गई है, वाहन चलाता है, को दण्डित किया जा सकता है.
(A) तीन माह तक का कारावास या पाँच हजार रूपया का जुर्माना या दोनो
(B) छ: माह तक का कारावास या एक हजार रूपया तक का जुर्माना
(C) केवल छः हजार रूपया का जुर्माना
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (*)

13. इंजन तेल में चिपचिपाहट (श्यानता) में परिवर्तन का मुख्य कारण है:
(A) ताप
(B) दूषण
(C) आर्द्रता
(D) कंपन

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Answer – (*)

14. विश्व में एच०आई०वी० संक्रमितों में भारत की स्थिति है:
(A) दूसरी
(D) तीसरी
(C) पहली
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (*)

15. मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अधीन ‘ओम्नीबस’ से तात्पर्य है।
(A) कोई मोटर वाहन जो सामान ले जाने हेतु निर्मित या अनुकूलित है।
(B) चालक को छोड़कर 6 से अधिक यात्रियों को ले जाने के लिए निर्मित या अनुकूलित कोई भी मोटर वाहन
(C) दोनों (A) तथा (B)
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (*)

16. टिहरी रियासत में ‘कीर्ति नगर आन्दोलन’ हुआः
(A) सन् 1950 ई० में
(B) सन् 1948 ई० में
(C) सन् 1949 ई० में
(D) सन् 1947 ई० में

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Answer – (D)

17. एच०आई०वी० पॉजीटिव व्यक्तियों के लिए प्रतीक है:
(A) नीला रिबन
(B) सफेद रिबन
(C) पीला रिबन
(D) लाल रिबन

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Answer – (D)

18. वाहनों में, ‘भारत स्टेज मानक’ प्राथमिक रूप से दर्शाता है:
(A) वायु प्रदूषक की मात्रा इंजन द्वारा
(B) इजन की क्षमता
(C) इंजन का आर०पी०एम०
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (A)

19. मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा-8(3) के अनुसार परिवहन वाहन चलाने के लिए प्रत्येक आवेदन के साथ संलग्नित होगा :
(A) पैन कार्ड
(B) ई-मेल आईडी०
(C) चिकित्सा प्रमाण पत्र
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

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Answer – (C)

20. उत्तराखण्ड में हस्तशिल्प व हथकरघा के विकास हेतु क्राफ्ट डिजाइन केन्द्र की उत्तराखण्ड में हस्तविक रिजाइन केन्द्र की स्थापना की गयी है :
(A) टनकपुर में
(B) हल्द्वानी में
(C) सेलाकुई में
(D) काशीपुर में

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Answer – (D)

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