करुण रस (Karuna Ras) | TheExamPillar
Karuna Ras

करुण रस (Karuna Ras)

करुण रस (Karuna Ras)

  • किसी प्रिय व्यक्ति के चिर विरह या मरण से उत्पन्न होने वाले शोक आदि के भाव की परिपक्वास्था को करुण रस कहा जाता है

करुण रस के अवयव (उपकरण)

  • करुण रस का स्थाई भाव – शोक। 
  • करुण रस का आलंबन (विभाव) – विनष्ट व्यक्ति अथवा वस्तु। 
  • करुण रस का उद्दीपन (विभाव) – आलम्बन का दाहकर्म, इष्ट के गुण तथा उससे सम्बंधित वस्तुए एवं इष्ट के चित्र का वर्णन। 
  • करुण रस का अनुभाव – भूमि पर गिरना, नि:श्वास, छाती पीटना, रुदन, प्रलाप, मूर्च्छा, दैवनिंदा, कम्प आदि। 
  • करुण रस का संचारी भाव – निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, श्रम, विषाद, जड़ता, दैन्य, उन्माद आदि ।

करुण रस के उदाहारण  –
(1) ‘करुणे, क्यों रोती है? उत्तर में और अधिक तू रोई।
मेरी विभूति है जो, उसको भवभूति क्यों कहे कोई?’।
(मैथिलीशरण गुप्त)

(2) ‘मुख मुखाहि लोचन स्रवहि सोक न हृदय समाइ।
मनहूँ करुन रस कटकई उत्तरी अवध बजाइ’।
(तुलसीदास)

(3) हाय रुक गया यहीं संसार
बना सिंदूर अनल अंगार
वातहत लतिका वह सुकुमार
पड़ी है छिन्नाधार!
(सुमित्रानंदन पंत)

(4) शोक विकल सब रोवहिं रानी।
रूप सीलु सबु देखु बखानी।।
करहिं विलाप अनेक प्रकारा।
परिहिं भूमि तल बारहिं बारा ।। (तुलसीदास)

(5) मेधा का यह स्फीत भाव औ’ अहंकार सब तभी जल गया,
पंचतत्त्व का चोला बदला, पंचतत्त्व में पुन: मिल गया,
मुझे याद आते हैं वे दिन, जब तुम ने की थी परिचर्या,
शैशव में, उस रुग्ण दशा में तेरी वह चिंतातुर चर्या !
(प्रभाकर माचवे)

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